पाठ्यक्रम: GS3/पर्यावरण
चर्चा में क्यों?
- हाल ही के एक अध्ययन में पाया गया कि आक्रामक विदेशी प्रजातियों का जैव विविधता पर सबसे अधिक प्रभाव वैश्विक दक्षिण के देशों में देखा जाता है। इसका कारण यह है कि वहाँ तेज़ विकास, कमज़ोर शासन व्यवस्था और सीमित प्रबंधन क्षमता के कारण पारिस्थितिक तंत्र अधिक संवेदनशील होते हैं।
आक्रामक विदेशी प्रजातियां
- वे पौधे, जानवर, रोगजनक और अन्य ऐसे जीव होते हैं, जो किसी पारिस्थितिक तंत्र के मूल निवासी नहीं होते और जो आर्थिक या पर्यावरणीय नुकसान पहुँचा सकते हैं या मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं।
- ये स्थानीय (मूल) प्रजातियों के साथ संसाधनों के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं, उनका शिकार करते हैं या उनमें बीमारियाँ फैलाते हैं, जिससे जैव विविधता को खतरा होता है।
क्या आप जानते हैं?
- वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972, जिसे 2022 में संशोधित किया गया, के अनुसार आक्रामक विदेशी प्रजातियाँ (IAS) ऐसे गैर-स्थानीय पौधे या जानवर हैं, जो अपने प्रवेश या प्रसार के माध्यम से भारत की जैव विविधता के लिए खतरा पैदा करते हैं। लेकिन यह परिभाषा बहुत सीमित है।
- इसमें उन भारतीय मूल प्रजातियों को शामिल नहीं किया गया है, जो देश के कुछ हिस्सों में आक्रामक बन जाती हैं।
- उदाहरण के लिए, चीतल (स्पॉटेड डियर) को मुख्य भूमि में संरक्षण प्राप्त है, लेकिन अंडमान द्वीपसमूह में यह पारिस्थितिक दृष्टि से हानिकारक बन चुका है।
महत्त्व और बहुआयामी संबंध
- पारिस्थितिक प्रभाव : आक्रामक विदेशी प्रजातियाँ (IAS) शिकार, प्रतिस्पर्धा और आवास (Habitat) में बदलाव के माध्यम से स्थानीय प्रजातियों के विलुप्त होने का कारण बनती हैं।
उदाहरण: लैंटाना कैमारा ने बांदीपुर और कॉर्बेट सहित भारत के कई संरक्षित वन क्षेत्रों में जंगलों की निचली वनस्पति की संरचना को बदल दिया है। - आर्थिक प्रभाव : आक्रामक कीटों और खरपतवारों के कारण कृषि में होने वाला नुकसान, छोटे किसानों पर आधारित अर्थव्यवस्थाओं में खाद्य सुरक्षा के लिए खतरा बनता है।
उदाहरण: फॉल आर्मीवर्म के फैलने के बाद अफ्रीका और भारत में मक्का की फसल को भारी नुकसान हुआ। - स्वास्थ्य पर प्रभाव : एडीज़ मच्छर जैसे आक्रामक रोग वाहक डेंगू और ज़ीका जैसी बीमारियों के फैलाव का क्षेत्र बढ़ा देते हैं। इससे जैव विविधता का प्रबंधन सीधे जन स्वास्थ्य सुरक्षा से जुड़ जाता है।
- जल सुरक्षा पर प्रभाव : जलकुंभी जैसी आक्रामक जलीय प्रजातियाँ जलाशयों को ढक देती हैं, जिससे सिंचाई, मत्स्य पालन और जलविद्युत उत्पादन प्रभावित होते हैं।
उदाहरण: मणिपुर की लोकटक झील में बार-बार जलकुंभी का प्रकोप देखा जाता है। - रणनीतिक और व्यापारिक पहलू : वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएँ और जहाजों का बैलास्ट जल आक्रामक विदेशी प्रजातियों के फैलने के प्रमुख माध्यम हैं। इसलिए IAS का प्रबंधन केवल घरेलू मुद्दा नहीं, बल्कि सीमा-पार शासन का भी एक महत्त्वपूर्ण विषय है।
चुनौतियाँ
- पर्यावरण, कृषि, व्यापार और सीमा शुल्क मंत्रालयों के बीच जिम्मेदारियों का बिखराव होने के कारण समन्वित कार्रवाई कमजोर पड़ जाती है।
- विकासशील देशों में जैव विविधता से संबंधित आधारभूत आँकड़ों की कमी के कारण आक्रामक प्रजातियों की समय रहते पहचान में देरी होती है।
- वित्तीय संसाधनों की कमी के कारण दीर्घकालिक उन्मूलन और पारिस्थितिक पुनर्स्थापन कार्यक्रमों को प्रभावी ढंग से लागू करना कठिन हो जाता है, जबकि इनकी लागत रोकथाम की तुलना में अधिक होती है।
- जलवायु परिवर्तन के कारण आक्रामक प्रजातियों के लिए उपयुक्त आवास का विस्तार हो रहा है, जिससे पहले से मौजूद प्रबंधन संबंधी कमियाँ और बढ़ रही हैं।
- जन-जागरूकता की कमी के कारण बागवानी, एक्वेरियम व्यापार और सजावटी पौधों के माध्यम से आक्रामक प्रजातियों का अनजाने में प्रसार होता है।
भारत की स्थिति और पहल
- भारत, जैव विविधता पर सम्मेलन का हस्ताक्षरकर्ता है और उसकी राष्ट्रीय जैव विविधता कार्य योजना में आक्रामक विदेशी प्रजातियों (IAS) का प्रबंधन एक प्रमुख विषय के रूप में शामिल है।
- जैव विविधता अधिनियम, 2002 और राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण इसके लिए नियामक ढाँचा प्रदान करते हैं, लेकिन इसका कार्यान्वयन अभी भी सभी राज्यों में समान रूप से प्रभावी नहीं है।
- वन विभागों ने संरक्षित क्षेत्रों में लैंटाना कैमारा और प्रोसोपिस जुलीफ्लोरा को हटाने के लिए विशेष अभियान चलाए हैं।
- कृषि मंत्रालय के अंतर्गत पादप संगरोध आदेश, 2003 आयात से जुड़ी जैव सुरक्षा को नियंत्रित करता है, लेकिन बंदरगाहों पर इसके प्रभावी क्रियान्वयन की क्षमता अभी भी सीमित है।
- भारत की राष्ट्रीय आक्रामक विदेशी प्रजाति कार्य योजना, जो मसौदा चरण में है, का उद्देश्य पूरे देश के लिए एकीकृत प्रतिक्रिया तंत्र विकसित करना है।
स्रोत: PTI
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संक्षिप्त समाचार 27-07-2026